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देवी तीर्थ नामक यह तीर्थ कैथल से लगभग 2 कि.मी. दूर कैथल-करनाल मार्ग पर गांव देवीगढ़ की सीमा पर स्थित है जो किंदान जप वाले कुण्ड जोहड़ के नाम से जाना जाता है। कलशी स्थित इस तीर्थ का नाम एवं महत्त्व महाभारत एवं वामन पुराण में स्पष्ट उपलब्ध होता है। महाभारत में इस तीर्थ का नाम एवं महत्त्व इस प्रकार वर्णित हैः
कलश्यांवार्युपस्पृश्य श्रद्धान्ते जितेन्द्रिय:।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्यफलं प्राप्नोति मानवः।
(महाभारत, वन पर्व 83/80)
अर्थात् श्रद्धावान एवं जितेन्द्रिय मनुष्य कलशी तीर्थ का सेवन करके अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
वामन पुराण में यह तीर्थ देवी तीर्थ के नाम से उल्लेखित है। वामन पुराण में इस तीर्थ का महत्त्व निम्न प्रकार से वर्णित है:
कलस्यां च नरः स्नात्वा दृष्ट्वा दुर्गां तटे स्थिताम्।
(वामन पुराण 36/18-19)
अर्थात् तत्पश्चात् कलशी नामक तीर्थ में जाना चाहिए जहाँ भद्रा, निद्रा माया, सनातनी एवं कात्यायनी रूपा दुर्गा देवी स्वयं अवस्थित हैं। कलशी तीर्थ में स्नान कर उसके किनारे पर स्थित दुर्गादेवी का दर्शन करने वाला मनुष्य निःसन्देह दुस्तर संसार दुर्ग को पार कर जाता है। इस तीर्थ में भाद्रपद मास में शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष की एकादशी को मेला लगता है।

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