पुण्डरीक नामक यह तीर्थ कैथल से 15 कि.मी. की दूरी पर पूण्डरी नामक शहर में स्थित है।
पुण्डरीक तीर्थ का वर्णन महाभारत एवं वामन पुराण दोनों में ही मिलता है। महाभारत के अनुसार इस तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य पुण्डरीक यज्ञ के फल को प्राप्त करता है:
शुक्लपक्षे दशम्यां च पुण्डरीकं समाविशेत्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन्पुण्डरीकफलं लभेत्।
(महाभारत, वन पर्व 83/83)
उक्त श्लोक से स्पष्ट है कि इस तीर्थ का सेवन शुक्ल पक्ष की दशमी को करना चाहिए। वामन पुराण में भी इस तीर्थ का सेवन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को ही करने का विधान है। वामन पुराण में इस तीर्थ का सेवन करने वाले मनुष्य को उसी फल विशेष का अधिकारी बताया गया है जिस फल विशेष का वर्णन महाभारत मंे है:
पौण्डरीके नरः स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत्।
दश्म्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रस्य तु विशेषतः।
स्नानं जपं तथा श्राद्धं मुक्तिमार्ग प्रदायकम्।।
(वामन पुराण 36/39-40)
अर्थात् शुक्ल पक्ष की दशमी (विशेषतः चैत्र मास की) को इस तीर्थ में किया गया स्नान, जप, एवं श्राद्ध मोक्ष पद को देने वाला होता है। महाभारत के सभा पर्व के पाँचवें अध्याय में पुण्डरीक नामक महायज्ञ का वर्णन है। लगभग 35 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ पूण्डरी तीर्थ परिसर कुरुक्षेत्र भूमि में स्थित विशाल तीर्थों में से एक है। सरोवर के पश्चिमी तट पर घाट से लगे हुए सात उत्तर मध्यकालीन मन्दिर हैं। इन मन्दिरों की आन्तरिक भित्तियों में पौराणिक एवं महाकाव्यों के प्रसंगों पर आधारित भित्तिचित्र हैं जिनमें गोपियों के मध्य श्रीकृष्ण, मत्स्यावतार, नृसिंहावतार, शेषशायी विष्णु, हनुमान, शिव-पार्वती इत्यादि प्रमुख हैं।

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