कुलोत्तारण नामक यह तीर्थ कैथल से लगभग 27 कि.मी. दूर कौल ग्राम में स्थित है। यह तीर्थ कपिलमुनि तीर्थ परिसर में ही स्थित है।
कुलों का उद्धार करने अथवा कुलों को तारने के कारण ही इस तीर्थ का नाम कुलोत्तारण हुआ। कुरुक्षेत्र भूमि में कुलोत्तारण नाम से दो तीर्थ पाए जाते है जिनमें से एक किरमच ग्राम में तथा दूसरा कौल ग्राम में है।
कुलोत्तारण नामक इस तीर्थ का उल्लेख महाभारत, वामन पुराण तथा नारद पुराण में मिलता है। महाभारत में इस तीर्थ का नाम कुलम्पुन है। वामन पुराण में उपलब्ध वर्णन से ज्ञात होता है कि इस काल में तीर्थ का पर्याप्त महत्त्व हो गया था। वामन पुराण के अनुसार इस तीर्थ का निर्माण भगवान विष्णु ने वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले मनुष्यों को तारने के लिए किया था। इस तीर्थ के महत्त्व के विषय में वामन पुराण में लिखा है:
ततोगच्छेत् विप्रेन्द्रास्तीर्थं कल्मषनाशनम्।
कुलोत्तारणनामानं विष्णुना कल्पितं पुरा।
तेऽपि तत्तीर्थमासाद्य पश्यन्ति परमं पदम्।
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।
कुलानि तारयेत् स्नातः सप्त सप्त च सप्त च।
(वामन पुराण 36/74-76)
अर्थात् तत्पश्चात् पाप का नाश करने वाले कुलोत्तारण नामक इस तीर्थ में जाना चाहिए जिसे विष्णु ने वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले मनुष्यों को तारने के लिए बनाया था। विशुद्ध मोक्ष की इच्छा करने वाले लोग उस तीर्थ में जाकर परम पद का दर्शन कर लेते हैं। चारों आश्रमों में स्थित लोग इस तीर्थ में स्नान करने से अपने इक्कीस पीढियों के पूर्वजों का उद्धार कर लेते हैं। नारद पुराण में इस तीर्थ के विषय में लिखा है कि कुलोत्तारण नामक तीर्थ में जाकर स्नान करने वाला पुरुष अपने कुल का उद्धार करके कल्प पर्यन्त स्वर्ग लोग में निवास करता है। तीर्थ सरोवर के घाटों के निर्माण में लाखौरी ईंटों का प्रयोग हुआ है।

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